2016


quotes by  Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानन्द के जीवन के 5 अनमोल वचन  (top 5 quotes by  Swami Vivekananda) 

1.केवल लक्ष्य पर ध्यान लगाओ .
2.सत्य का साथ कभी न छोड़े .
3.मुसीबत से डरकर भागो मत, उसका सामना करो .
4.माँ से बढ़कर कोई नहीं .
5.नारी का सदैव सम्मान करे


नहीं करे ये काम नहीं तो आपसे रुठ जायेंगी महालक्ष्मी

शास्त्रों में कई ऐसे कार्य बताए गए हैं जिन्हें करने पर देवी-देवताओं का क्रोध झेलना पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति से भगवान क्रोधित हो जाते हैं तो उसे कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। देवी-देवताओं में धन की देवी महालक्ष्मी का महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति जीवन में सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता है।

महालक्ष्मी के रुठ जाने पर व्यक्ति को पैसों की तंगी झेलना पड़ती है। ऐसे में लाख मेहनत करने के बाद भी उचित धन प्राप्त नहीं हो पाता है। यदि व्यक्ति पहले से ही धनी हो और उससे लक्ष्मीजी रुठ जाए तो उसका समस्त धन भी नष्ट हो सकता है। अत: शास्त्रों द्वारा वर्जित कार्य हमें नहीं करना चाहिए।

महालक्ष्मी को क्रोधित करने वाले कार्यों में प्रमुख है झूठे हाथों से देवी-देवताओं की प्रतिमा या चित्रों को छूना। यदि कोई व्यक्ति कुछ खाने के बाद झूठे हाथों से ही भगवान को स्पर्श करता है तो उसे देवी-देवताओं का कोप सहना पड़ता है। घर की बरकत चली जाती है। कड़ी मेहनत के बाद भी व्यक्ति के पास पैसा नहीं आता। इसके अलावा पर्स में रखा पैसा भी अनावश्यक कार्यों में तुरंत ही खर्च होने लगता। अत: इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में झूठे हाथों से  भगवान को स्पर्श बिलकुल भी न  करें। भगवान के सामने जाने से पहले पूरी तरह से  पवित्र होकर ही जाना चाहिए। प्रसाद ग्रहण करने के बाद तुरंत हाथ धो लेना चाहिए।


चूहों का  मंदिर

चूहों का  मंदिर 

मां करणी देवी का विख्यात मंदिर राजस्थान के बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जोधपुर रोड पर गांव देशनोक की सीमा में स्थित है। यह भी एक तीरथ धाम है, लेकिन इसे चूहे वाले मंदिर के नाम से भी देश और दुनिया के लोग जानते हैं। अनेक श्रद्धालुओं का मत है कि करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा की अवतार थीं। अब से लगभग साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व जिस स्थान पर यह भव्य मंदिर है, वहां एक गुफा में रहकर मां अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। मां के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी इच्छानुसार उनकी मूर्ति की इस गुफा में स्थापना की गई। बताते हैं कि मां करणी के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना हुई थी। मां के अनुयायी केवल राजस्थान में ही नहीं, देशभर में हैं, जो समय-समय पर यहां दर्शनों के लिए आते रहते हैं। संगमरमर से बने मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है।
चूहे श्रद्धालुओं के शरीर पर कूद-फांद करते हैं, लेकिन किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरों से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर बारीक जाली लगी हुई है। इन चूहों की उपस्थिति की वजह से ही श्री करणी देवी का यह मंदिर चूहों वाले मंदिर के नाम से भी विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि किसी श्रद्धालु को यदि यहां सफेद चूहे के दर्शन होते हैं, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। सुबह पांच बजे मंगला आरती और सायं सात बजे आरती के समय चूहों का जुलूस तो देखने लायक होता है।


दो नाविक थे। वे नाव द्वारा नदी की सैर करके सायंकाल तट पर पहुँचे और एक-दूसरे से कुशलता का समाचार एवं अनुभव पूछने लगे। पहले नाविक ने कहाः "भाई ! मैं तो ऐसा चतुर हूँ कि जब नाव भँवर के पास जाती है, तब चतुराई से उसे तत्काल बाहर निकाल लेता हूँ।" तब दूसरा नाविक बोलाः "मैं ऐसा कुशल नाविक हूँ कि नाव को भँवर के पास जाने ही नहीं देता।" अब दोनों में से श्रेष्ठ नाविक कौन है ? स्पष्टतः दूसरा नाविक ही श्रेष्ठ है क्योंकि वह भँवर के पास जाता ही नहीं। पहला नाविक तो किसी न किसी दिन भँवर का शिकार हो ही जायगा।
इसी प्रकार सत्य के मार्ग अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले पथिकों के लिए विषय विकार एवं कुसंगरूपी भँवरों के पास न जाना ही श्रेयस्कर है। अगर आग के नजदीक बैठोगे जाकर, उठोगे एक दिन कपड़े जलाकर। माना कि दामन बचाते रहे तुम, मगर सेंक हरदम लाते रहे तुम।। कोई जुआ नहीं खेलता, किंतु देखता है तो देखते-देखते वह जुआ खेलना भी सीख जायगा और एक समय ऐसा आयगा कि वह जुआ खेले बिना रह नहीं पायेगा। इसी प्रकार अन्य विषयों के संदर्भ में भी समझना चाहिए और विषय विकारों एवं कुसंग से दूर ही रहना चाहिए। जो विषय एवं कुसंग से दूर रहते हैं, वे बड़े भाग्यवान हैं। जिस प्रकार धुआँ सफेद मकान को काला कर देता है, उसी प्रकार विषय-विकार एवं कुसंग नेक व्यक्ति का भी पतन कर देते है। 
'सत्संग तारे, कुसंग डुबोवे।' 
जैसे हरी लता पर बैठने वाला कीड़ा लता की भाँति हरे रंग का हो जाता है, उसी प्रकार विषय-विकार एवं कुसंग से मन मलिन हो जाता है। इसलिए विषय-विकारों और कुसंग से बचने के लिए संतों का संग अधिकाधिक करना चाहिए। कबीर जी ने कहाः 
संगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत। साकुट काली कामली, धोते होय न सेत।।
कबीर संगत साध की, दिन-दिन दूना हेत। साकत कारे कानेबरे, धोए होय न सेत।। 

अर्थात् संत-महापुरूषों की ही संगति करनी चाहिए क्योंकि वे अंत में निहाल कर देते हैं। दुष्टों की संगति नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनके संपर्क में जाते ही मनुष्य का पतन हो जाता है। 
संतों की संगति से सदैव हित होता है, जबकि दुष्ट लोगों की संगति गुणवान मनुष्यों का भी पतन हो जाता है

सकारात्मक सोच (Positive thinking)

एक  आदमी समुद्रतट पर चल रहा था। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक युवक ने रेत पर झुककर कुछ
 उठाया और आहिस्ता से उसे पानी में फेंक दिया। उसके नज़दीक पहुँचने पर आदमी ने उससे पूछा – “और भाई,
 क्या कर रहे हो?”
युवक ने जवाब दिया – “मैं इन मछलियों को समुद्र में फेंक रहा हूँ।”
“लेकिन इन्हें पानी में फेंकने की क्या ज़रूरत है?”- आदमी बोला।

युवक ने कहा – “ज्वार का पानी उतर रहा है और सूरज की गर्मी बढ़ रही है।अगर मैं इन्हें वापस पानी में नहीं फेंकूंगा 
तो ये मर जाएँगी”।
आदमी ने देखा कि समुद्रतट पर दूर-दूर तक मछलियाँ बिखरी पड़ी थीं। वह बोला – “इस मीलों लंबे समुद्रतट पर न जाने 
कितनी मछलियाँ पड़ी हुई हैं। इसतरह कुछेक को पानी में वापस डाल देने से तुम्हें क्या मिल जाएगा? इससे क्या फर्क
 पड़ जायेगा?”युवक ने शान्ति से आदमी की बात सुनी, फ़िर उसने रेत पर झुककर एक और मछली उठाई और 
उसे आहिस्ता से पानी में फेंककर वह बोला :

आपको इससे कुछ मिले न मिले
मुझे इससे कुछ मिले न मिले
दुनिया को इससे कुछ मिले न मिले
लेकिन “इस मछली को सब कुछ मिल जाएगा”।

दोस्तों यह केवल सोच का ही फर्क है| सकारात्मक सोच (Positive thoughts) वाले व्यक्ति को लगता है कि उसके
 छोटे छोटे प्रयासों से किसी को बहुत कुछ मिल जायेगा लेकिन नकारात्मक सोच (Negative Thoughts) के
 व्यक्ति को यही लगेगा कि, यह समय की बर्बादी है?


दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र

मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों के रक्षार्थ परमगोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों को बताया, जो देवी की नौ मूर्तियां-स्वरूप हैं, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि श्री दुर्गा सप्तशती दैत्यों के संहार की शौर्य गाथा से अधिक कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी महात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्रोत एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है।

दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र

* सर्वकल्याण हेतु -
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥

* बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए इस मंत्र का जाप फलदायी है-
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भव‍िष्यंति न संशय॥

घर की दशा सुधारिये गृह-दश सुधर जायेगी

* मंदिर एवं पूजास्थल को साफ-सुथरा रखने से 'गुरु-ग्रह' अनुकूल होता है और अच्छे फल देता है |
* रसोई को गंदा रखने से जीवन में मंगल-ग्रह से संबंधित दिक्कतें आती हैं |
* जूठे बर्तन या जूठी थाली को यथास्थान छोड़ देना ठीक नहीं, इन्हें बर्तन साफ करने के स्थान पर रख देने अथवा स्वयं ही साफ कर देने से चंद्रमा और शनि-ग्रह ठीक रहते हैं |
* स्नानघर में कपड़े बिखरे रहने या गीले कपड़े वहाँ पड़े रहने से अथवा पानी फैला रहने से चंद्रमा अच्छे फल नहीं देता |

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं  फायदे
घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं  फायदे

पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से है. देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियमित रूप से बजाते हैं.जो न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि कई दूसरे तरह से भी फायदेमंद हैं पर क्या आपको पता है घर में शंख रखने और बजाने से क्या फायदे होते है  ।


शंख की पूजा इस मंत्र के साथ की जाती है.= त्वं पुरा सागरोत्पन्न:विष्णुनाविघृत:करे देवैश्चपूजित:
                                                                  सर्वथैपाञ्चजन्यनमोऽस्तुते।


1. जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है. धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है. शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है.
2. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं.
3. पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है. जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं. अच्छे विचारों का फल भी स्वाभाविक रूप से बेहतर ही होता है.
4. शंख के जल से शिव, लक्ष्मी आदि का अभिषेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है.
5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है.
6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है. ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं. इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं.


यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह अशुभ स्थिति में है तो व्यक्ति को कठिन परिश्रम के बाद भी सफलता आसानी से प्राप्त नहीं हो पाती है। ज्योतिष के अनुसार कुंडली में 12 भाव होते हैं और इन्हीं 12 भावों में सभी नौ ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) विचरण करते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म समय पर ग्रहों की जो स्थिति होती है, उसका असर व्यक्ति के पूरे जीवन रहता है।

भारतीय ज्योतिष में कुंडली के अशुभ ग्रहों के दोष दूर करने के सरल तरीके सुझाए गए हैं, जानिए अचूक उपाय | इन उपायों को अपनाने से अशुभ ग्रह भी शुभ फल देते हैं।

१.अगर आपका सूर्य अशुभ है तो पिता की सेवा करें।

२. अगर आपका चंद्र अशुभ है तो मां का आशीर्वाद लें।

३.अगर पिछले जन्म का मां का कर्ज है तो इस जन्म में मंगल अशुभ होगा। मां को मीठा खिलाएं

४.अगर आपका बुध अशुभ है तो बहन व बुआ का आशीर्वाद लें। उन्हें प्रसन्न रखें।

५.गुरु अशुभ है तो समझिए कि पिछले जन्म का मंदिर का ऋण है। अत: मंदिर में सेवा करें। दादा या किसी बजुर्ग की सेवा करें।

६.अगर कुंडली में शुक्र अशुभ है तो समझिए पिछले जन्म का पत्नी का ऋण है। अपनी पत्नी से कभी तेज आवाज में बात न करें। पत्नी का अपमान न करें। उसे गुलाबी वस्तु उपहार में दें।

७.अगर कुंडली में शनि-राहु अशुभ हैं तो है अपने अधीनस्थ लोगों को हमेशा खुश रखें। नौकरों पर गुस्सा न करें।

८.अगर केतु कुंडली में अशुभ है तो पिछले जन्म का पुत्र दोष है। अत: इस जन्म में पुत्र से बैर न रखें। उसे मनचाही वस्तु 



सिर पर चोटी क्यों रखी जाती है?

वैदिक संस्कृति में चोटी को 'शिखा' कहते हैं। स्त्रियां भी चोटी रखती हैं। उसका भी कारण है। मुंडन और उपनयन संस्कार के समय यह किया जाता है। प्रत्येक हिन्दू को यह करना होता है। इस संस्कार के बाद ही बच्चा द्विज कहलाता है। 'द्विज' का अर्थ होता है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, अब बच्चे को पढ़ाई करने के लिए गुरुकुल भेजा जा सकता है। पहले यह संस्कार करते समय यह तय किया जाता था कि बच्चों को ब्राह्मणत्व ग्रहण करना है, क्षत्रियत्व या वैश्यत्व। जब यह तय हो जाता था ‍तभी उसके अनुसार शिक्षा दी जाती थी। पहले सभी शूद्र कहलाते थे।

प्रत्येक स्त्री तथा पुरुष को अपने सिर पर चोटी यानी कि बालों का समूह अनिवार्य रूप से रखना चाहिए।

बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है जिसे मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। उपनयन संस्कार बच्चे के 6 से 8 वर्ष की आयु के बीच में किया जाता है। इसमें यज्ञ करके बच्चे को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं। बालक को जनेऊ पहनाकर गुरु के पास शिक्षा अध्ययन के लिए ले जाया जाता था। वैदिक काल में 7 वर्ष की आयु में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता था। आजकल तो 3 वर्ष की आयु में ही स्कूल में दाखिला लेना होता है।
सिर में सहस्रार के स्थान पर चोटी रखी जाती है अर्थात सिर के सभी बालों को काटकर बीचोबीच के स्थान के बाल को छोड़ दिया जाता है। इस स्थान के ठीक 2 से 3 इंच नीचे आत्मा का स्थान है। भौतिक विज्ञान के अनुसार यह मस्तिष्क का केंद्र है। विज्ञान के अनुसार यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। हमारे ऋषियों ने सोच-समझकर चोटी रखने की प्रथा को शुरू किया था।

इस स्थान पर चोटी रखने से मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। शिखा रखने से इस सहस्रार चक्र को जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सहस्रार चक्र का आकार गाय के खुर के समान होता है इसीलिए चोटी का आकार भी गाय के खुर के बराबर ही रखा जाता है।

मिशन विचार क्रांति शान्तिकुंज हरिद्वार के अनुसार असल में जिस स्थान पर शिखा यानी कि चोटी रखने की परंपरा है, वहां पर सिर के बीचोबीच सुषुम्ना नाड़ी का स्थान होता है तथा शरीर विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि सुषुम्ना नाड़ी इंसान के हर तरह के विकास में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चोटी सुषुम्ना नाड़ी को हानिकारक प्रभावों से तो बचाती ही है, साथ में ब्रह्मांड से आने वाले सकारात्मक तथा आध्यात्मिक विचारों को कैच यानी कि ग्रहण भी करती है।

चोटी को रखने के ज्योतिषीय लाभ : जिस किसी की भी कुंडली में राहु नीच का हो या राहु खराब असर दे रहा है तो उसे माथे पर तिलक और सिर पर चोटी रखने की सलाह दी जाती है।



भगवान गौतम बुद्ध के अनमोल विचार (quotes by gautam buddha )

Quote 1 : All that we are is the result of what we have thought. If a man speaks or acts with an evil thought, pain follows him. If a man speaks or acts with a pure thought, happiness follows him, like a shadow that never leaves him.
In Hindi :हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम  करता है , तो उसे कष्ट ही मिलता है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ कभी नहीं छोडती .

Quote 2 :Better than a thousand hollow words, is one word that brings peace.
In Hindi :हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये.


भगवान गौतम बुद्ध के अनमोल विचार (quotes by gautam buddha)

Quote 3 :All wrong-doing arises because of mind. If mind is transformed can wrong-doing remain?
In Hindi : सभी बुरे कार्य  मन के कारण उत्पन्न होते हैं. अगर मन परिवर्तित हो जाये तो क्या अनैतिक कार्य रह सकते हैं?

Quote 4: A jug fills drop by drop.
In Hindi : एक जग बूँद बूँद कर के भरता है.

Quote 5 : Do not dwell in the past, do not dream of the future, concentrate the mind on the present moment.
In Hindi :अतीत पे धयान मत दो, भविष्य के बारे में मत सोचो, अपने मन को वर्तमान क्षण पे केन्द्रित करो.

Quote 6 :Health is the greatest gift, contentment the greatest wealth, faithfulness the best relationship.
In Hindi :स्वस्थ्य सबसे बड़ा उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन है, वफ़ादारी सबसे बड़ा सम्बन्ध है.

Quote 7 : Just as a candle cannot burn without fire, men cannot live without a spiritual life.
In Hindi :जैसे मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती , मनुष्य भी आध्यात्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकता.

Quote 8 : Three things cannot be long hidden: the sun, the moon, and the truth.
In Hindi : तीन चीजें जादा देर तक नहीं छुप सकती, सूरज, चंद्रमा और सत्य.

Quote 9 :Work out your own salvation. Do not depend on others.
In Hindi :अपने मोक्ष के लिए खुद ही प्रयत्न करें. दूसरों पर निर्भर ना रहे.

Quote 10 : You will not be punished for your anger, you will be punished by your anger.
In Hindi : तुम अपने क्रोध के लिए दंड नहीं पाओगे, तुम अपने क्रोध द्वारा दंड पाओगे.

Quote 11: An insincere and evil friend is more to be feared than a wild beast; a wild beast may wound your body, but an evil friend will wound your mind.
In Hindi : किसी जंगली जानवर की अपेक्षा एक कपटी और दुष्ट मित्र से  ज्यादा डरना चाहिए, जानवर तो बस आपके शरीर को नुक्सान पहुंचा सकता है, पर एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुक्सान पहुंचा सकता है.

Quote 12:Do not overrate what you have received, nor envy others. He who envies others does not obtain peace of mind.
In Hindi : आपके पास जो कुछ भी है  है उसे बढ़ा-चढ़ा कर मत बताइए, और ना ही दूसरों से इर्श्या कीजिये. जो दूसरों से इर्श्या करता है उसे मन की शांति नहीं मिलती.

Quote 13:Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
In Hindi : घृणा घृणा से नहीं प्रेम से ख़तम होती है, यह शाश्वत सत्य है.

Quote 14:He who loves 50 people has 50 woes; he who loves no one has no woes.
In Hindi : वह जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पचास संकट हैं, वो  जो किसी से प्रेम नहीं करता उसके एक भी संकट नहीं है.


(quotes by gautam buddha
Quote 15:Holding on to anger is like grasping a hot coal with the intent of throwing it at someone else; you are the one who gets burned.
 In Hindi : क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकडे रहने के सामान है; इसमें आप ही जलते हैं.

Quote 16:However many holy words you read, however many you speak, what good will they do you if you do not act on upon them?
 In Hindi : चाहे आप जितने पवित्र शब्द पढ़ लें या बोल लें, वो आपका क्या भला करेंगे जब तक आप उन्हें उपयोग में नहीं लाते?

Quote 17:I never see what has been done; I only see what remains to be done.
In Hindi : मैं कभी नहीं देखता की क्या किया जा चुका है; मैं हमेशा देखता हूँ कि क्या किया जाना बाकी है.

Quote 18:Without health life is not life; it is only a state of langour and suffering – an image of death.
In Hindi : बिना सेहत के जीवन जीवन नहीं है; बस पीड़ा की एक स्थिति है- मौत की छवि है.

Quote 19:What we think, we become.
In Hindi : हम जो सोचते हैं , वो बन जाते हैं.


(gautam buddha quotes)
Quote 20:There is nothing more dreadful than the habit of doubt. Doubt separates people. It is a poison that disintegrates friendships and breaks up pleasant relations. It is a thorn that irritates and hurts; it is a sword that kills.
In Hindi : शक की आदत से भयावह कुछ भी नहीं है. शक लोगों को अलग करता है. यह एक ऐसा ज़हर है जो मित्रता ख़तम करता है और अच्छे रिश्तों को तोड़ता है.यह एक काँटा है जो चोटिल करता है, एक तलवार है जो वध करती है.

Quote 21 : There are only two mistakes one can make along the road to truth; not going all the way, and not starting.
In Hindi : सत्य के मार्ग पे चलते हुए कोई दो ही गलतियाँ कर सकता है; पूरा रास्ता ना तय करना, और इसकी शुरआत ही ना करना.

Quote 22 : In a controversy the instant we feel anger we have already ceased striving for the truth, and have begun striving for ourselves.
In Hindi : किसी विवाद में हम जैसे ही क्रोधित होते हैं हम सच का मार्ग छोड़ देते हैं, और अपने लिए प्रयास करने लगते हैं.



किसी मनुष्य द्वारा देवी-देवताओं की आराधना करना एक सद्गुण माना जाता है लेकिन अगर यही गुण किसी पशु या अन्य जीव में दिखाई दे तो इसे किसी आश्चर्य से कम नहीं समझा जाता। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को नाग बहुत प्रिय हैं।
वे गले में हार के स्थान पर नाग को ही धारण करते हैं। भारत में भी नागपंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है। भगवान विष्णु शेष नाग की शैया पर शयन करते हैं। क्या भगवान का नागों से विशेष संबंध है? विज्ञान और अध्यात्म की इस बारे में अलग राय हो सकती है लेकिन कुछ घटनाएं पुनः इस प्रश्न पर चिंतन के लिए विवश कर देती हैं।
उत्तरप्रदेश के आगरा के पास स्थित एक गांव है – सलेमाबाद। गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां पिछले करीब 15 वर्षों से एक नाग रोज आकर भगवान शिव को नमन करता है।
इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु शिवजी की पूजा करने आते हैं लेकिन नाग का इस तरह आना जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। यह नाग रोज मंदिर में आता है और करीब 5 घंटे तक यहां रुकता है।
नाग सुबह 10 बजे आता है और शाम को 3 बजे वापस लौट जाता है। इस अवधि में यह शिवलिंग के पास ही बैठा रहता है। यहां आसपास के गांवों में भी इस नाग की चर्चा है। इससे श्रद्धालुओं को कोई भय नहीं है और न इसने कभी किसी को नुकसान पहुंचाया।
हालांकि नाग के मंदिर में प्रवेश करने के बाद मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान कोई और व्यक्ति मंदिर में प्रवेश नहीं करता। 3 बजने के बाद नाग वहां से चला जाता है।
उसके बाद ही लोग मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने जाते हैं। किसी सर्प का इतनी लंबी अवधि से रोज मंदिर में आकर शिवलिंग के पास रुकने को यहां के लोग आश्चर्य से ज्यादा श्रद्धा का विषय मानते हैं।


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥2-23॥

अर्थ : न शस्त्र इसे काट सकते हैं, न आग इसे जला सकती है... न पानी इसे भिगो सकता है, न हवा इसे सुखा सकती है... (यहां भगवान कृष्ण शरीर में मौजूद आत्मा की बात कर रहे हैं...)

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥2-37॥

अर्थ : यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि जीतते हो तो इस धरती को भोगोगे... इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन का नाम), और निश्चय करके युद्ध करो...

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥4-7॥

अर्थ : हे भारत, जब-जब धर्म का लोप होता है, और अधर्म बढ़ता है... तब-तब मैं स्वयम् स्वयम् की रचना करता हूं...

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥4-8॥

अर्थ : साधु पुरुषों के कल्याण के लिए, और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए... तथा धर्म की स्थापना के लिए मैं युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता हूं...

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥2-47॥

अर्थ : कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं... कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो...

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥2-62॥

अर्थ : विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे लगाव हो जाता है... इससे उनमें इच्छा पैदा होती है और इच्छाओं से गुस्सा पैदा होता है...

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥2-63॥

अर्थ : गुस्से से दिमाग खराब होता है और उससे याददाश्त पर पर्दा पड़ जाता है... याददाश्त पर पर्दा पड़ जाने से आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाने पर आदमी खुद ही का नाश कर बैठता है...

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥3-35॥

अर्थ : अपना काम ही अच्छा है, चाहे उसमें कमियां भी हों, किसी और के अच्छी तरह किए काम से...
अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है, किसी और के काम से चाहे उसमें डर न हो...

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥3-21॥

अर्थ : क्योंकि जो एक श्रेष्ठ पुरुष करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं... वह जो करता है, उसी को प्रमाण मानकर अन्य लोग भी पीछे वही करते हैं...

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥4-39॥

अर्थ : श्रद्धा रखने वाले, अपनी इन्द्रियों पर संयम कर ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं... और ज्ञान मिल जाने पर, जल्द ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं...

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥18-48॥

अर्थ : हे कौन्तेय, अपने जन्म से उत्पन्न (स्वाभाविक) कर्म को उसमें दोष होने पर भी नहीं त्यागना चाहिए... क्योंकि सभी आरम्भों में (कर्मों में) ही कोई न कोई दोष होता है, जैसे अग्नि धुएं से ढकी होती है...

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥18-66॥

अर्थ : सभी धर्मों को त्याग कर (हर आश्रय त्याग कर), केवल मेरी शरण में बैठ जाओ...मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो..


शिव परिवार के बारे में सबसे अद्भुत बात यह है कि शिवजी के परिवार के हर एक सदस्य का वाहन है लेकिन उनका वाहन बैल है। जिसे नंदी कहते हैं। इसीलिए हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी बैठे होते  है, पर क्या आपको पता है शिव मंदिर के बाहर बैठे नंदी की मूर्ति क्यों होती है ? दरअसल शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ यानी मेहनत का प्रतीक है। अब सवाल यह बनता है कि नंदी शिवलिंग की ओर ही मुख करके बैठे होते  है? जानते हैं दरअसल नंदी का संदेश है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है।
जैसे नंदी की नजर शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी नजर भी आत्मा की ओर हो। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी का इशारा यही होता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही आम भाषा में मन का साफ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाता है।

छोटी-छोटी बातों पर बड़े विवाद हो जाते हैं , तो करे ये उपाए

घर-परिवार में अक्सर विवाद हो जाते हैं , तो करे ये उपाए 

घर-परिवार में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर बड़े विवाद हो जाते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कभी-कभी एक-दूसरे सदस्य के प्रति जलन की भावना पैदा हो जाती है और वहीं से मनमुटाव बढऩे लगता है। जहां संयुक्त परिवार रहते हैं वहां अक्सर सास-बहु, देवरानी-जेठानी और भाइयों के बीच तू-तू, मैं-मैं होती रहती है। इस प्रकार की परिस्थितियां काफी परिवारों में बनती है।
शास्त्रों में परिवार से इस प्रकार की मानसिकता दूर करने के लिए कई उपाय और छोटी-छोटी परंपराएं बताई गई हैं। इनका पालन करने पर परिवार के सभी सदस्यों का आपसी प्रेम बना रहता है और किसी प्रकार का क्लेश नहीं उपजता। परिवार के सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम और स्नेह बना रहे इसके लिए घर में श्रीराम दरबार का फोटो लगाना चाहिए।
श्रीराम दरबार का प्रतिदिन दर्शन करें। यह ऐसे स्थान पर लगाना चाहिए जहां सभी सदस्य आसानी से भगवान के दर्शन कर सके। श्रीराम को परिवार का देवता माना गया है। श्रीराम के पूजन और दर्शन मात्र से परिवार के बीच के सभी मनमुटाव और वाद-विवाद समाप्त हो जाते हैं।
श्रीराम के दर्शन से परिवार के सभी सदस्यों की सोच सकारात्मक बनेगी और वे सभी एक-दूसरे के प्रति समर्पित भावना भी रखेंगे। प्रतिदिन श्रीराम के दर्शन करने से परिवार पर किसी प्रकार की कोई विपदा भी नहीं आएगी। घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनी रहेगी और पैसों की तंगी दूर होगी।



शिव – कल्याण स्वरूप
महेश्वर – माया के अधीश्वर
शम्भू – आनंद स्स्वरूप वाले
पिनाकी – पिनाक धनुष धारण करने वाले
शशिशेखर – सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
विरूपाक्ष – भौंडी आँख वाले
कपर्दी – जटाजूट धारण करने वाले
नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले
शंकर – सबका कल्याण करने वाले
शूलपाणी – हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
अंबिकानाथ – भगवति के पति
श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
भक्तवत्सल – भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
भव – संसार के रूप में प्रकट होने वाले
शर्व – कष्टों को नष्ट करने वाले
त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले
शिवाप्रिय – पार्वती के प्रिय
उग्र – अत्यंत उग्र रूप वाले
कपाली – कपाल धारण करने वाले
कामारी – कामदेव के शत्रु
अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
गंगाधर – गंगा जी को धारण करने वाले
ललाटाक्ष – ललाट में आँख वाले
कालकाल – काल के भी काल
कृपानिधि – करूणा की खान
भीम – भयंकर रूप वाले
परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले
जटाधर – जटा रखने वाले
कैलाशवासी – कैलाश के निवासी
कवची – कवच धारण करने वाले
कठोर – अत्यन्त मजबूत देह वाले
त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर को मारने वाले
वृषांक – बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
वृषभारूढ़ – बैल की सवारी वाले
भस्मोद्धूलितविग्रह – सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले
त्रयीमूर्ति – वेदरूपी विग्रह करने वाले
अनीश्वर – जिसका और कोई मालिक नहीं है
सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
परमात्मा – सबका अपना आपा
सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
हवि – आहूति रूपी द्रव्य वाले
यज्ञमय – यज्ञस्वरूप वाले
सोम – उमा के सहित रूप वाले
पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
सदाशिव – नित्य कल्याण रूप वाले
विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
वीरभद्र – बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
गणनाथ – गणों के स्वामी
प्रजापति – प्रजाओं का पालन करने वाले
हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
दुर्धुर्ष – किसी से नहीं दबने वाले
गिरीश – पहाड़ों के मालिक
गिरिश – कैलाश पर्वत पर सोने वाले
अनघ – पापरहित
भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले
भर्ग – पापों को भूंज देने वाले
गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
गिरिप्रिय – पर्वत प्रेमी
कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले
पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
भगवान् – सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले
सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
जगद्गुरू – जगत् के गुरू
व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले
महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले
रूद्र – भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
भूतपति – भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी को धारण करने वाले
दिगम्बर – नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले
अनेकात्मा – अनेक रूप धारण करने वाले
सात्त्विक – सत्व गुण वाले
शुद्धविग्रह – शुद्धमूर्ति वाले
शाश्वत – नित्य रहने वाले
खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
अज – जन्म रहित
पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
मृड – सुखस्वरूप वाले
पशुपति – पशुओं के मालिक
देव – स्वयं प्रकाश रूप
महादेव – देवों के भी देव
अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले
हरि – विष्णुस्वरूप
पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले
अव्यग्र – कभी भी व्यथित न होने वाले
दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
हर – पापों व तापों को हरने वाले
भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले
अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले
सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले
अनंत – देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
तारक – सबको तारने वाला
परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर

भोजन से पहले गाय को खिलाएं गोग्रास
गोग्रास

सनातन धर्म परंपराएं संस्कार, मर्यादा, भावनाओं और जीवन मूल्यों से ओतप्रोत है। इसी कड़ी में गाय को ग्रास यानी भोजन से पहले उसका कुछ हिस्सा गाय को खिलाना भी प्रमुख है। जो धार्मिक परंपरा ही नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए एक अहम सबक भी जुड़ा है, जो खुशहाल जीवन के लिए बेहद अहम है।

जानिए, क्या है गाय को गोग्रास  देने के पीछे खास संदेश

सनातन धर्म में गाय पवित्र और पूजनीय प्राणी है। इसके पीछे समुद्र मंथन से कामधेनु का निकलना या गाय में करोड़ों देवी-देवताओं के वास होने की धार्मिक मान्यताएं भी प्रमुख हैं। वहीं, व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि गाय के दूध से लेकर मूत्र तक शरीर को निरोगी रखने वाले होते हैं।
इस तरह देखा जाए तो पावनता ही गाय की सबसे बड़ी खासियत है। गो ग्रास भी गाय की तरह कर्म, स्वभाव, चरित्र और आचरण की पवित्रता का अहम संदेश देता है। क्योंकि ऐसा होने पर ही किसी व्यक्ति का परिवार या समाज में मान, प्रतिष्ठा, रुतबा और समर्थन बढ़ता है।
यही नहीं, गाय स्वभाव से अहिंसक प्राणी है, जो सिखाती है कि स्वभाव से भद्र बने। भद्र यानी विनम्र, निडर, खुले और सीधी सोच का इंसान। जिसकी संगति हर कोई पसंद करता है।
इस तरह गोग्रास परंपरा से चरित्र और स्वभाव की पावनता का सूत्र अपनाएं। जिससे मिला यशस्वी और सफल जीवन आपके साथ पूर्वजों का भी मान-सम्मान बरकरार रखेगा। वैसे ही जैसे गाय और उसकी देह का हर अंश अपेक्षित और पूजनीय है।


श्री गणेशा पंचारातना स्तोत्रं 


मुदा करात्त मॊदकं सदा विमुक्ति साधकम् ।
कलाधरावतंसकं विलासिलॊक रक्षकम् ।
अनायकैक नायकं विनाशितॆभ दैत्यकम् ।
नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥
नतॆतराति भीकरं नवॊदितार्क भास्वरम् ।
नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् ।
सुरॆश्वरं निधीश्वरं गजॆश्वरं गणॆश्वरम् ।
महॆश्वरं तमाश्रयॆ परात्परं निरन्तरम् ॥ 2 ॥
समस्त लॊक शङ्करं निरस्त दैत्य कुञ्जरम् ।
दरॆतरॊदरं वरं वरॆभ वक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् ।
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करॊमि भास्वरम् ॥ 3 ॥
अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनॊक्ति भाजनम् ।
पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।
प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् ।
कपॊल दानवारणं भजॆ पुराण वारणम् ॥ 4 ॥
नितान्त कान्ति दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजम् ।
अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् ।
हृदन्तरॆ निरन्तरं वसन्तमॆव यॊगिनाम् ।
तमॆकदन्तमॆव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ 5 ॥
महागणॆश पञ्चरत्नमादरॆण यॊ‌உन्वहम् ।
प्रजल्पति प्रभातकॆ हृदि स्मरन् गणॆश्वरम् ।
अरॊगतामदॊषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।
समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सॊ‌உचिरात् ॥


 पूजा में कुश का उपयोग क्यों होता है ( Why should we use kusa in puja )

हिंदू धर्म में किए जाने वाले धार्मिक कर्म-कांडों में विशेष अवसरों पर कुश ( एक विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा कोई भी जप कुश के आसन पर बैठकर करने का ही विधान है। पर क्या आपको पता है कुश  का उपयोग पूजा क्यों किया जाता है |

धार्मिक कारण

हम  पूजा पाठ,जप,यज्ञ आदि में बैठने के लिए कुश का इस्तेमाल करते हैं !कुश की अंगुठी बनाकर अनामिका उंगली मे पहनने का विधान है, ताकि हाथ में संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए, क्योंकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश मिलता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकता है।
कर्मकांड के दौरान यदि भूल से हाथ जमीन पर लग जाए तो बीच में कुश का ही स्पर्श होगा। इसलिए कुश को हाथ में भी धारण किया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह भी है कि हाथ की ऊर्जा की रक्षा न की जाए, तो इसका बुरा असर हमारे दिल और दिमाग पर पड़ता है।

वैज्ञानिक कारण 

 कुश धारण करने से सिर के बाल नहीं झड़ते और छाती में आघात यानी दिल का दौरा नहीं होता। उल्लेखनीय हे कि वेद ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दुषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

सर्व कष्ट निवारण मंत्र  बगलामलामन्त्र

माँ बगला का यह मला मंत्र काफी लाभदयक है, इस मंत्र को सर्व कष्ट निवारण मंत्र भी कहा जाता है |
आप इस मंत्र का जप समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए, आपत्ति में, भय निवारण के लिए, ऊपरी दोष दूर करने के लिए ,रोग निवारण के लिए कर सकते है |

Mantra In Hindi 

ॐ नमो भगवती ॐ नमो वीर प्रताप विजय भगवति बगलामुखि मम सर्व निन्दकानां सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय ब्राह्मीं मुद्रय-मुद्रय, बुद्धिं विनाशय-विनाशय, अपरबुद्धिं कुरू-कुरू, आत्मविरोधिनां शत्रुणां शिरो-ललाट-मुख-नेत्र-कर्ण-नासिकोरू-पद-अणुरेशु-दन्तोष्ठ-जिह्वां-तालु- गुह्य-गुद-कटि-जानू-सर्वांगेषु-
केशादिपादपर्यन्तं-पादादिकेशपर्यन्तं स्तम्भय स्तम्भय, खें खीं मारय मारय परमन्त्र परयन्त्र परतन्त्राणि छेदय-छेदय, आत्ममन्त्र-यन्त्र-तन्त्राणि रक्ष-रक्ष, ग्रहं निवारय-निवारय, व्याधिं विनाशय-विनाशय, दुःखं हर-हर, दारिद्रयं निवारय-निवारय, सर्वमन्त्र स्वरूपिणी, सर्वतन्त्रस्वरूपिणी, सर्वशिल्प प्रयोग स्वरूपिणी, सर्व तत्व स्वरूपिणी, दुष्ट ग्रह-भूतग्रह-आकाशग्रह-पाषाणग्रह-सर्वचाण्डाल ग्रह-यक्ष किन्नर किम्पुरूष ग्रह, भूत प्रेत पिशाचानां शाकिनी डाकिनी ग्रहाणां पूर्वदिशां बन्धय-बन्धय, वार्तालि मां रक्ष-रक्ष, दक्षिण दिशां बन्धय-बन्धय किरातवार्ताली मां रक्ष-रक्ष, पश्चिम दिशं बन्धय-बन्धय स्वप्न वार्तालि मां रक्ष-रक्ष, उत्तर दिशां बन्धय-बन्धय कालि मां रक्ष-रक्ष, उध्र्व दिशं बन्धय-बन्धय उग्रकालि मां रक्ष-रक्ष, पाताल दिशं बन्धय-बन्धय बगला परमेश्वरि मां रक्ष-रक्ष, सकल रोगान् विनाशय-विनाशय, सर्वशत्रु पलायनाय पंचयोजन मध्ये, राज-जन-स्त्री-वशतां कुरू-कुरू, शत्रुन् दह-दह, पच-पच, स्तम्भय-स्तम्भय, मोहय-मोहय, आकर्षय-आकर्षय, मम शत्रून् उच्चाटय-उच्चाटय हुं फट् स्वाहा ।

Mantra In English 

om namo bhagavatī om namo vīra pratāpa vijaya bhagavati bagalāmukhi mama sarva nindakānāṃ sarva duṣṭānāṃ vācaṃ mukhaṃ padaṃ stambhaya-stambhaya brāhmīṃ mudraya-mudraya, buddhiṃ vināśaya-vināśaya, aparabuddhiṃ kurū-kurū, ātmavirodhināṃ śatruṇāṃ śiro-lalāṭa-mukha-netra-karṇa-nāsikorū-pada-aṇureśu-dantoṣṭha-jihvāṃ-tālu- guhya-guda-kaṭi-jānū-sarvāṃgeṣu-keśādipādaparyantaṃ-pādādikeśaparyantaṃ stambhaya stambhaya, kheṃ khīṃ māraya māraya paramantra parayantra paratantrāṇi chedaya-chedaya, ātmamantra-yantra-tantrāṇi rakṣa-rakṣa, grahaṃ nivāraya-nivāraya, vyādhiṃ vināśaya-vināśaya, duḥkhaṃ hara-hara, dāridrayaṃ nivāraya-nivāraya, sarvamantra svarūpiṇī, sarvatantrasvarūpiṇī, sarvaśilpa prayoga svarūpiṇī, sarva tatva svarūpiṇī, duṣṭa graha-bhūtagraha-ākāśagraha-pāṣāṇagraha-sarvacāṇḍāla graha-yakṣa kinnara kimpurūṣa graha, bhūta preta piśācānāṃ śākinī ḍākinī grahāṇāṃ pūrvadiśāṃ bandhaya-bandhaya, vārtāli māṃ rakṣa-rakṣa, dakṣiṇa diśāṃ bandhaya-bandhaya kirātavārtālī māṃ rakṣa-rakṣa, paścima diśaṃ bandhaya-bandhaya svapna vārtāli māṃ rakṣa-rakṣa, uttara diśāṃ bandhaya-bandhaya kāli maṃ rakṣa-rakṣa, urdhva diśaṃ bandhaya-bandhaya ugrakāli māṃ rakṣa-rakṣa, pātāla diśaṃ bandhaya-bandhaya bagalā parameśvari māṃ rakṣa-rakṣa, sakala rogān vināśaya-vināśaya, sarvaśatru palāyanāya paṃcayojana madhye, rāja-jana-strī-vaśatāṃ kurū-kurū, śatrun daha-daha, paca-paca, stambhaya-stambhaya, mohaya-mohaya, ākarṣaya-ākarṣaya, mama śatrūn uccāṭaya-uccāṭaya huṃ phaṭ svāhā .   

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