आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर (patal bhuvneshwar) के नाम से जाना जाता है
“शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ् स्मराणत् स्पर्च्चनादेव
पूजनात् किं ब्रवीम्यहम् सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्वर”
: –स्कन्द पुराण मानसखंड 103/10-11
व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं, जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्वर है।
आज में आपको एक ऎसी गुफा के बारे में बता रहा है जो उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गंगोलीहाट कस्बे में स्थित है | उत्तराखण्ड के लगभग प्रत्येक गाँव का अपना देवता (कुलदेवता या ग्रामदेवता) होता है. मुख्यतः यह देवी देवता शिव, भगवती के रूप अथवा लोककथाओं से सम्बन्धित चरित्र होते हैं. यह क्षेत्र कई तरह के चमत्कारों से भरा हुआ है, जिन्हें देखकर सामान्य मनुष्य को परमपिता परमेश्वर की प्रभुसत्ता पर विश्वास करना ही पडता है आज में आपको जिस रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहा हु, इस गुफा से ऎसी मान्यताएं जु़डी हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। गुफा के बारे में बताया जाता है कि इसमें दुनिया के समाप्त होने का भी रहस्य छुपा है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। पाताल भुवनेश्वर का दर्शन भी एक अदभुत अनुभव का मौका देता है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह स्थान पाताल अर्थात धरातल के नीचे स्थित है. समुद्र तल से पातालभुवनेश्वर की उंचाई 1350 मीटर हैपौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव ने सतयुग में तपस्या के लिए पातालभुवनेश्वर गुफा को बनाया था। कलयुग में आदि शंकराचार्य ने इसकी पुन: प्राण प्रतिष्ठा की। यहां केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के दर्शन भी होते हैं। पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हों। यह पवित्र व रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है।
स्कन्दपुरान में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहाँ आते हैं. स्कन्दपुरान में ही यह भी वर्णन है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा रितुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रविष्ट हुए तो उन्होने इस गुफा के भीतर महादेव शिव सहित 33 करोड देवताओं के साक्षात दर्शन किये. कलयुग में आज से लगभग 1000 साल पहले आदिगुरू शंकराचार्य ने एक शिवलिंग यहां स्थापित किया, जो अब भी विद्यमान है.
रहस्मयी गुफा में 92 फुट तक नीचे जाना आसान नहीं है। 82 संकरी छोटी-मोटी तेडी-मेडी सीढ़ियाँ आपको गुफा के गर्भ तक ले जाती हैं, जो किसी रोमांच से कम नही है। सीढ़ियां ख़त्म होने पर 160 मीटर में फैली सराबोर गुफा, आस्था के महासमुद्र समान है।
शेषनाग का निवास स्थान
सबसे पहले बड़ा सा फन फैलाए शेषनाग बना है। कहते हैं इसने अपने फन पर सारी पृथ्वी को धारण कर रखा है। यहां शेषनाग के रीढ़ की हड्डियां भी दिखती ही हैं, साथ ही उनकी विष की थैली के भी दर्शन होते हैं। यह दृश्य किसी अजूबे से कम प्रतीत नहीं होता।
राजा परीक्षित और तक्षक सर्प का वर्णन
आगे बढने पर एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है। कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु तक्षक नाम का एक नाग बच निकला जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया। हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है | पौराणिक कथाओं के अनुसार एक ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि उनकी मौत सर्प के डसने से होगी। इस वजह से इस हवन कुंड में उन्होंने यज्ञ शुरू किया। एक-एक कर सारे सर्प आकर हवनकुंड में समाने लगे, लेकिन तक्षक नामक सर्प आकर इसी गुफा में छुपा हुआ था। तक्षक एक फल में समा गया और बाद में राजा उसने राजा परीक्षित को डंस लिया। राजा परीक्षित की इस वजह से मौत हो गई।
ब्रह्मा के हंस वाली मूर्ति के होते हैं दर्शन
थोडा सा आगे बढने पर एक हंस की प्रतिमा है जिसकी गर्दन पीछे की ओर मुडी हुई है | पौराणिक कथाओं के अनुसार इस हंस को ब्रह्मा जी ने अम्रत की रखवाली की जिम्मेदारी दी थी परन्तु लोभ में आकर यह उसे पीने को आतुर हुआ. ब्रह्मा जी के श्राप के फलस्वरूप इसकी गर्दन पीछे की ओर मुड गयी.
भगवान गणेश से जुडी पौराणिक मान्यता
यही गुफा हमें एक और पौराणिक मान्यता से अवगत कराती है। मान्यता है की अपने पुत्र गणेश से क्रोधित होकर भगवान शिव ने उनके शीश को धड़ से अलग कर दिया था तो आदि गणेश जी का कटा शीश इसी स्थान पर रखा गया था।गणेश जी के कटे हुए शीश के उपर अष्टदल कमल का फूल है। कहा जाता है कि इस कमल के फूल से तब तक अमृत का छिड़काव होता रहा, जब तक आदि गणेश के लिए हाथी के शीश का प्रबंध नही कर लिया गया। आज भी उस कमल के फूल की पंखुड़ियों से गणेश भगवान के उपर जल गिरता रहता है। अचरज की बात यह है कि इस फूल के आसपास कोई पानी का स्रोत नहीं है फिर भी इतने सालो से यहाँ जल कहा से आता है किसी को नहीं पता । यह किसी चमत्कार से कम नही है।
कलयुग के समाप्ति का राज
एक और आश्चर्य वह चार प्रस्तर खण्ड हैं जो चार युगों अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शातें हैं. इनमें पहले तीन आकारों में कोई परिवर्तन नही होता. लेकिन माना जाता है कि कलियुग को दर्शाने वाली शिला का आकार धीरे-धीरे बड रहा है, और कलियुग का अन्त उस दिन हो जायेगा जब यह शिला बडते-बडते अपने ऊपर की छत को छू जायेगी.
गुफा के अन्दर चार धाम
गुफा के अन्दर चार धाम ही बद्रीनाथ, केदारनाथ सहित चारों धामों के प्रतीक उपस्थित हैं. मान्यता है कि पाताल भुवनेश्वर के दर्शन से ही चार धाम के दर्शन के पुण्य की प्राप्ति हो जाती है |इसके अतिरिक्त गुफा के भीतर कई अन्य प्राक्रतिक शिलाखण्ड हैं. जैसे द्युतक्रीडा में रत पाण्डव, आकाशगंगा, शिव जी की जटाएं, कालभैरव की जिह्वा और कल्पव्रक्ष आदि.



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